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Tuesday, December 30, 2008

किसान और कृषि

नतीजे परम्परा से नाता तोड़ने के


सचिन कुमार जैन

राजगढ़ के एक व्यक्ति, जिसका नाम यूं तो राधेष्याम सेन है किन्तु वह आगे चल कर इस कहानी में उस विनाष की दास्तान हैं जिसे हमने अपनी पारम्परिक और सांस्कृतिक कृषि पध्दतियों को त्याग कर अपनाया है। आज हर रोज हम इस तथ्य पर चर्चा कर रहे हैं कि पूरे देष को अन्न उपलब्ध करवाने वाला राज्य पंजाब स्वयं अनाज आयात करने की स्थिति में पहुंच गया है, विकसित राज्य आंध्रप्रदेष, जहां से देष में नवीनतम तकनीक का प्रवेष होता है में हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं, और तो और उत्तारप्रदेष और बिहार में हजारों टन आलू और धान को खरीदने वाला कोई नहीं है। अब हमें यह मानना पडेग़ा कि भारत में आज जो विपत्ति ग्रामीण व्यवस्था पर हावी हो रही है उसके पीछे सबसे बड़ा कारण है समाज और संस्कृति से जुड़े जीवन से संबंध विच्छेद। 1960-70 के दषक में देष में आई हरितक्रांति ने क्या वास्तव में हमें कोई ऐसा संदेष दिया था जिसका पालन करने का परिणाम यह हो रहा है कि मात्र 30 वर्ष बाद किसान अपनी लागत भी निकाल पाने में अक्षम होता जा रहा है। निष्चित रूप से नहीं, किंतु उस संदेष पर कहीं न कहीं किसान की आर्थिक महत्तवाकांक्षा हावी हो गई और ज्यादा उत्पादन की चाह में उसने जमीन और उसकी उर्वरता के अस्तित्व को भी दांव पर लगा दिया।
कुछ दिनों पहले जब गुना जिले के एक वृध्द किसान से यह पूछा गया कि खेती के लिये जमीन का चुनाव आप कैसे करते हैं तो उन्होंने कहा था कि जिस खेत में सांप होते है वह बड़ी ही उपजाऊ जमीन होती है। शायद आपको यह महसूस होगा कि यह अंधविष्वास की बात है किन्तु यह निहायत ही तकनीकी मसला है। चौधरी रामलाल का मतलब यह है कि जिस खेत में सांप होंगे वहां चूहे होंगे और जहां चूहे होंगे वहां केंचुये होंगे, और केंचुये मिट्टी को उर्वर बनाने की प्राकृतिक प्रक्रिया के संवाहक हैं। परन्तु डीडीटी, बीएचसी और अन्य रासायनिक कीटनाषकों के छिड़काव के कारण आज खेतों में केवल 35 फीसदी सांप और चूहे रह गये हैं। ज्यादा मात्रा में रासायनिक पदार्थों के फलस्वरूप खेतों की मिट्टी की पानी सोखने और नम बने रहने की प्रवृत्ति भी समाप्त हो चली है। मिट्टी के ठोस और कठोर होते जाने के कारण बरसात का पानी जमीन के भीतर प्रवेष न करके बह जाता है जिससे भूमिगत जल स्तर कम होने लगा है। और इस समस्या से निपटने के लिये 27 सौ करोड़ रुपये का वाटर शेड कार्यक्रम चलाया जा रहा है। हाल ही में राजगढ़ जिले के कुछ सरपंचों ने यह प्रस्ताव एक स्वयंसेवी संस्था को दिया कि जिले में बहने वाली छापी नदी पर जगह-जगह लाखों रुपये की लागत से स्टाप डेम बना दिये जायें ताकि किसानों को सिंचाई के लिये पानी मिल सके। शासन इसे उनकी जागरूकता कह सकता है किन्तु हकीकत में वे अभिषप्त हैं। ये लोग अपनी पारम्परिक तकनीकें भूल चुके हैं। आज जिस काम के लिये वे लाखों रुपये की मांग कर रहे है वही कार्य वे स्वयं शून्य लागत से करते रहे हैं। 1947 के पहले राजसी दौर में राज्यादेष के अनुरूप राजगढ़ में हर तीन माह में हर किसान श्रमदान करके अपने खेत से लगे नदी, तालाब या नाले से हल चला कर खेत में पानी को बहने के लिये नाली बनाकर मार्ग देता था और समय-समय पर उसमें जमने वाली मिट्टी हटा देता था, यह परम्परा कई सदियों तक चलती रही परन्तु आज वाटर शेड के नाम पर जगह-जगह पर करोड़ों रुपये खर्च करके स्टाप डेम बनाये जा रहे हैं जो पांच साल बाद अपना नकारात्मक स्वरूप सामने लायेंगे जब उनकी उंचाई तक पानी में बह कर आई गाद और मिट्टी जम जायेंगी। तब एक और नई परियोजना चलाई जायेगी।
इसी संदर्भ को आगे बढ़ाते हुये हम यह भी कह सकते हैं कि औद्योगिकीकरण और सरकारी नीतियों ने कृषि को भी एक उद्योग बना दिया है। परन्तु भारतीय संस्कृति के अनुसार कृषि एक सामाजिक संस्कृति है। आज यह साफ देखने में आता है कि किसानों के बीच स्तर भेद बढ़ता जा रहा है। उद्योगपति 4 सौ एकड़ जमीन खरीद लेता और उसे किराये पर उठा देता है जबकि छोटा किसान इतना छोटा होता जा रहा है कि न तो उसके पास सिंचाई के साधन बचे हैं न फसल कटाई के। वह यदि कुयें से सिंचाई करता है तो पता चलता है कि आस-पास के उद्योगपति किसानो ने टयूबवेल लगा कर भूमिगत जल का इतना दोहन किया कि कुआं ही खाली हो गया। यदि हम पुन: सांस्कृतिक पहलू पर चर्चा करें तो दिखाई पड़ता है कि कुछ दषक पहले तक मधयप्रदेष के गांवों में कृषि आधारित व्यवस्था के अन्तर्गत मजदूर और किसान के बीच एक मानवीय संबंध था। गुना जिले में यदि किसी किसान के खेत पर काम करने वाला मजदूर भूखा सोता था तो उसकी सार्वजनिक निन्दा होती थी और पंचायत के नियमानुसार उसके यहां कोई मजदूर काम करने नहीं जाता था तब उस किसान को 16 गांव दूर जाकर मजदूर लाने पड़ते थे। उस दौर में मजदूरी को मुद्रा में न माप कर अनाज और जीवन की बुनियादी जरूरतों की सामग्री से मापा जाता था पर 1980 के दषक के बाद फिर एक रणनीति के तहत ऐसा वातावरण बनाया गया कि मजदूरी के बदले मुद्रा दी जाने लगी। फिर इसके बाद किसान ने यह आकलन लगाना शुरू किया कि 50 रुपये रोज का मजदूर रखने से बेहतर है कि थ्रेषर से खेत कटवा लिया जाये और फिर सामाजिक संबंध भी खत्म हुये और असमानता भी बढ़ने लगी। हमारा कहना निष्चित तौर पर यह भी नहीं है प्रदेष की वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के कोई मायने नहीं हैं फिर भी यह शंका अब साकार रूप लेने लगी है कि भविष्य में अस्तित्व का स्वरूप बहुत अच्छा नहीं होगा।
आधुनिकीकरण का विरोध करना यूं तो लाजिमी नहीं है फिर भी यह तो ईमानदारी से स्वीकार करना ही पड़ेगा कि कृषि पध्दतियों के वैज्ञानिक स्वरूप ने कई सामाजिक और पर्यावरण संबंधी विसंगतियां पैदा की है। अब तक की भारतीय परम्परा पर यदि नजर डाली जाये तो यह स्पष्ट होता है कि खेतों की जुताई में बैलों की उपयोगिता केवल उसकी क्षमता और षक्ति को ही प्रतिबिंबित नहीं करती है अपितु उसके खुरों का आकार काफी छोटा होता है जिससे मिट्टी पर दबाव कम पड़ता है। और हल आंषिक रूप से दबी हुई मिट्टी को उर्वर-बनाता है। इस संदर्भ में जब से ट्रेक्टर ने खेतों में प्रवेष किया है तब से स्थिति में कई परिवर्तन आये हैं। ट्रेक्टर के पहिये और उसके भारी वजन के कारण जमीन पर ज्यादा दबाव पड़ता है तो भूमि ठोस होती जाती है और यह इतनी कठोर हो जाती है कि बरसात के पानी को सोखने की उसकी क्षमता नहीं रहती है। इसी कारण भूमि का जल स्तर निरन्तर घटता जा रहा है॥ अत: जो सामाजिक परिस्थितियाँ हमारे सामने खड़ी हो रही है उनसे यही संकेत मिलते हैं कि किसानों को अपनी पारंपरिक कृषि पध्दति की व्यावहारिकता और उसकी जरूरत का पुन: मूल्यांकन करना होगा।
यह एक कहानी ही है जो हमने षुरू की थी राजगढ़ के राधेष्याम सेन के नाम से। यही राधेष्याम सेन गवाह है कृषि की पध्दति और सामाजिक अर्थव्यवस्था के बदलते स्वरूप और बदलते सम्बन्धों का। राधेष्याम एक नाई है और जिस क्षेत्र से वह सम्बन्ध रखता है वहां प्रति वयस्क मजदूरी तय है 16 किलो अनाज। यहां एक नाई के कार्यक्षेत्र में 7 गांव हैं। हर दिन के लिये एक गांव। यदि एक गांव में औसतन 20 परिवार माने जायें तो राधेष्याम 140 परिवारों के लिये प्रति माह कार्य करता है और उसकी मजदूरी होती है 2240 किलो अनाज। इसके साथ ही हर सार्वजनिक कार्यक्रम के अवसर पर सौ किलो अनाज पर उसका अधिकार होता है। यह पध्दति बढ़ई, सुतार और अन्य वर्गों पर भी लागू होती रही है। एक दलित आंदोलन के फलस्वरूप उसे बराबरी का हक मिला और उसे मिली 10 एकड़ जमीन। पर उसने यही पाया कि यह सौदा घाटे का रहा। राधेष्याम ने बीच में बैंक में नौकरी षुरू की थी पर पांच साल में उसे व्यवस्था के उतार चढ़ाव ने खासा अनुभवी बना दिया और वह नौकरी छोड़ कर पुन: इस परम्परा का पालन करने चला आया। यह कहानी हमें एक दिषा तो दे ही सकती है उस समाज की ओर जिसमें राधोष्याम जैसे व्यक्ति को 2240 किलो अनाज मिलता हो (जिसका कृषि से कोई सरोकार नहीं है) और फिर हम तुलना कर सकते हैं उस समाज से जहां 6000 किसान आत्महत्या करते हों।