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Tuesday, December 01, 2009

मीडिया - लोकतंत्र

यह मीडिया लोकतंत्र की क्या ख़ाक रक्षा करेगा?


द हिन्दू के पी साईनाथ ने मीडिया के चेहरे पर चढ़ा एक और चेहरा हटा दिया है. पता चला है कि विधानसभा चुनावों के पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हान के बारे में - जिसे अशोक पर्व का नाम दिया गया, 47 अखबारों में पूरे-पूरे पेज की सामग्री का प्रकाशन किया गया. इनमे से किसी पर भी इस सामग्री के विज्ञापन होने का उल्लेख नहीं था, यानी यह पूरी सामग्री खबर या लेख के परिभाषा के तहत प्रकाशित की गई थी. दूसरी तरफ इस सन्दर्भ में यह भी महत्व पूर्ण है कि भारत के चुनाव आयोग के निर्देशों के मुताबिक कोई भी उम्मीदवार अपने चुनाव अभियान में 10 लाख रूपए से ज्यादा खर्च नहीं कार सकता है और हर उम्मीदवार को अपने चुनावी खर्चे का हिसाब देना अनिवार्य है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने चुनाव आयोग को बताया कि उन्होंने चुनाव में 6000 रूपए से भी कम खर्च किया हैं. अशोक चव्हान ने यह नहीं बताया कि मीडिया के गिरते चरित्र का लाभ उठा कर उन्होंने इन 47 अखबारों में छापी नियोजित ख़बरों के लिए कितना भुगतान किया? एक आकलन के मुताबिक इन सामाग्रियों कि कुल कीमत 6.5 करोड़ बैठती है. आप यह भी जान लें कि चुनावों के दौरान ज्यादातर मीडिया जो कहता है या बताता है, वह सुनियोजित और भुगतान की गई सामग्री होती है. जिस तरह से मीडिया का पूंजीवादी और बाजारीकरण हुआ है उसके कारण मीडिया की विश्वनीयता लगभग ख़त्म सी हो गई. पिछले चुनावों में भी उत्तरप्रदेश की लखनऊ सीट के उम्मीदवार लाल जी टंडन ने बेहद खुले शब्दों में कहा था कि वहाँ के एक बड़े अखबार ने उन पर चिनावी पैकेज लेने के लिए दबाव डाला था, और जब उन्होंने अखबार का पैकेज नहीं लिया तो उसने (अखबार ने) उनके खिलाफ खबर अभियान चलाया. उसने माहोल बनाने का काम किया कि लाल जी टंडन हार रहे हैं, पर मीडिया भले ही बिक जाए लोकतंत्र अभी जिन्दा है, इसीलिए मतदाता ने अखबार के सुनियोजित विश्लेषण को नज़रंदाज़ करके उन उम्मीद वारों को हराया जो मीडिया के चुनावी पैकेज खरीद कर चुनाव लड़ रहे थे. गुजरात में काम कर रहे एक वरिष्ठ पत्रकार अशोक उमट ने कहा कि ऐसा होता है और इससे उन अखबारों के लिए चुनौती बढ़ रही है जो इस तरह कि धारा में बहे बिना पत्रकारिता करने की मंशा रखते हैं.
बिना किसी आंकलन या स्रोत के हम कह सकते हैं कि चुनावों में मीडिया पक्षपात करता है और अपनी ताकत के बेंचता है. इस आरोप को कोई चुनोती इसलिए नहीं दे सकता है क्योंकि हम कह्ब्रों को पढ़ कर यह अच्छे से महसूस कर सकते हैं कि कौन सी खबर के लिए भुगतान किया है. यह जांचने के लिए किसी प्रयोगशाला में जाने की जरूरत नहीं है. बस खबर को मन से पढने की जरूरत होती है.
चूँकि अब ख़बरों के मामले में बहुत गड़बड़ हो रही है, इसीलिए उसे छिपाने के लिए मीडिया अखबारों में सामग्री की प्रस्तुति को ऐसा बनाने की जद्दोजहद में है कि नागरिक का ध्यान तथ्यों और वास्तविकता पर न जा पाये. इसे ही रोचकता और पैकेजिंग का नाम दिया गया है. अखबार अब अपनी ख़बरों से नहीं बल्कि पाठकों को पावडर, बाल्टी, छुरी-चाक़ू-छिलनी, जैसी वस्तुओं का लालच देकर आकर्षित करते हैं. मीडिया यह महसूस नहीं कर रहा है कि इस तरह के कर्मकांड करके वह वास्तव में लोकतंत्र के लिए खतरे खड़े कर रहा है. अब एक बार फिर यह बहस होनी ही चाहिए कि क्या मीडिया भी केवल एक बाजारू व्यवसाय है या उससे कुछ ज्यादा? यदि हम इसे पूंजीवादी और अनैतिकता की जमीन पर खड़ी इमारत मानते हैं तो फिर इसमें कोई शक नहीं है आने वाले किसी भी दिन कोई अखबार व्यवसाय की नाम पर आतंकवादी समूहों के लिए लोबयिंग का काम करे. लाभ के लालच में देश और समाज की प्राथमिकताएं भी उलट-पुलट कर दी गई हैं. देश और प्रदेशों के बड़े अखबारों में चाप रहे विज्ञापनों से पता चलता है कि भारत में सबे बड़ी समस्या पुरुषों का लिंग छोटा होना है, इसी लिए एक-एक पेज पर 15-20 विज्ञापन उन दुकानों के होते हैं, जो 500 रूपए के एक पट्टीनुमा यन्त्र से लिंग को बढा कर देने का दावा करते हैं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा लगता है कि लोगों के निजी जीवन में रोमंच्कता और मित्रता नहीं राह गई है इसीलिए एक विज्ञापन चपता है कि आप फ़ोन पर रोमांचित कर देने वाली बातें करके अपने जीवन में रस भर सकते हैं. कोई और देखे या न देखे पर अखबार का सम्पादक यह क्यों नहीं देखता है कि उसके नेत्रत्व में उसके अखबार में देशी-विदेशी युवतियों से मालिश करवाने के लिए आमंत्रित करने वाला विज्ञापन क्यों छप पहा है. सरकार तो नहीं ही देख रही है इसी लिए मीडिया की जिम्मेदारियां और बढ़ जाती हैं, पर यहाँ तो मीडिया के भ्रष्ट होने की गति सबसे तेज होती जा रही है. कुछ गिने-चुने व्यक्तियों को अगर छोड़ दें तो बाकी को तो संपादक माना ही नहीं जा सकता है, वे अपनी कंपनियों के मुनीम से ज्यादा कुछ नहीं है. समाज और राजनीति दोनों ही स्तरों पर मीडिया के चरित्र का पतन लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं. अशोक उमट जी का यह मानना भी बिलकुल सही ही लगता है कि भारतीय प्रेस परिषद् जैसे संस्थानों के भी कोई बखत बची नहीं है, अब तो नागरिक पाठकों को ही जंग लड़ना होगी, दुश्मन के खिलाफ भी और मीडिया के खिलाफ भी.