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Tuesday, December 30, 2008

बुंदेलखंड में आजीविका की चुनौतियां


बुंदेलखंड में

जलवायु परिवर्तन और

आजीविका की चुनौतियां

सचिन कुमार जैन

अब बुंदेलखंड में मौसम का पूर्वानुमान लगा पाना बेहद मुष्किल हो गया है। पहले हम जलवायु पध्दति के आधार पर कृषि तथा पषुओं के लिए योजनाबध्द तरीके अपनाते थे। लेकिन अब हमारे बस में कुछ नहीं रहा। ठेठ गर्मियों में तूफान आते हैं और बारिष षुरू हो जाती है। वहीं मानूसन में बारिष के दर्षन तक नहीं होते। और षीत ऋतु में इतनी ज्यादा ठंड पड़ती है कि हमारी सब्जियां, गेहूं और दूसरी तमाम फसलें खराब हो जाती है। इस साल ठंड इतनी कम पड़ी कि खेती फिर संकट में आ गई है। यह कहना है कि मध्यप्रदेष के टीकमगढ़ जिले में रह रहे टीला गांव के किसानों के एक समूह का जो बीते कई सालों से यहां हो रहे जलवायु परिवर्तन की मार झेलने को अभिषप्त हैं। वर्तमान मौसमी संकेत अगले साल खूब गरम होने की चेतावनी दे रहे हैं। ऐसी स्थिति अब तक कभी भी नजर नहीं आई थी। ताजा स्थितियों में मध्य और उत्तारी भारत ठोस जाड़े के मौसम में वातावारण गर्मी से तप रहा है।

चार साल बाद इस साल हमनें यहां बारिष देखी। लेकिन जून के दूसरे सप्ताह में ही हमारे क्षेत्र मौसम की करीब 32 फीसदी बरसात हो चुकी थी। लेकिन किसान इतनी जल्दी फसल बोने के लिए तैयार नहीं थे। बुंदेलखंड के ज्यादातर हिस्से में इस साल षुरू में ही सालाना बारिष का करीब 55 फीसदी हिस्सा बरस चुका था। यूं तो रिकार्ड के मुताबिक छतरपुर में 968.8 मिलीमीटर के मुकाबले 1108.3 मिलीमीटर वर्षा हो चुकी है यानी औसत से ज्यादा; इसके आधार पर अब बुन्देलखण्ड के छतरपुर के ज्यादातर जिले सूखे की सरकारी परिभाषा से ही बाहर हैं किन्तु यहीं के राजनगर विकासखण्ड के ललपुर, गुन्चू और प्रतापपुरा जैसे 40 से ज्यादा गांवों को पानी की तरावट नसीब नहीं हुई है। यहां चारे, बिजली और सिंचाई के साधनों का भी संकट है, पर अभी वहां कोई राहत नहीं पहुंचेगी। मौसम के इस बदलाव से कई इलाकों में बाढ़ आई और उर्वर जमीन के क्षय के साथ-साथ पषुओं का भी बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ। बुंदेलखंड में कृषि की इस बदहाली का असर यहां के पषुओं पर भी साफ तौर पर देखा जा सकता है।

प्रभावित क्षेत्र के ज्यादातर परिवारों ने या तो सूखे के असर के चलते अपने पषु गंवा दिए या फिर उनके अपनी किस्मत के भरोसे खुला छोड़ दिया गया। यहां लोग अपने और परिवार की जिंदगी के लिए हर दिन नई चुनौती से जूझ रहे थे, अपने पषुओं के बारे में सोचना उनके लिए काफी दूर की चीज थी। विगपुर के हकीम सिंह यादव के पास कभी 37 जानवर हुआ करते थे, अब वे काफी दुख के साथ बताते हैं कि उनके पास केवल 7 जानवर ही बचे हैं। जलवायु के इस अनिष्चित रवैये के चलते क्षेत्र में हुई पर्याप्त बारिष भी यहां की खेती के लिए कोई फायदा नहीं पहुंचा पाई। छतरपुर व पन्ना जिलों में भी इस असमान बारिष की मौजूदगी जरूर महसूस की गई लेकिन बीते 15 सालों से जारी सूखे तथा जंगलों के कटने के चलते बारिष के पानी को बटोरने तथा भविष्य के लिए इस्तेमाल करने की क्षमता भी बेहद सीमित नजर आई।

हाल के कुछ वर्षों में पूर्वी मध्यप्रदेष सूखे की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। वास्तव में पिछले साल (2007-08) तो करीब 39 जिले सूखा प्रभावित घोषित कर दिए गए थे, इनमें से ज्यादातर बुंदेलखंड क्षेत्र में ही थे। इस साल (2008-09) सूखे का असर पष्चिमी मध्यप्रदेष की ओर बढ़ गया है और करीब 21 जिले सूखा प्रभावित (वे जिले जहां बारिष -20 से -59 फीसदी तक कम हुई हो) के रूप में पहचाने जा चुके हैं। इन सात जिलों, छिंदवाड़ा, देवास, हरदा, होषंगाबाद, सीहोर, खरगौन तथा पन्ना में औसत की तुलना में करीब 40 फीसदी कम बरसात हुई है। इससे पता चलता है कि समूचा मध्यप्रदेष ही धीरे-धीरे सूखा प्रभावित भौगोलिक क्षेत्र बनता जा रहा है।

मध्यप्रदेष की नई नीतियों व तथाकथित विकास योजनाओं, जिनमें खनन, सीमेंट उत्पादन व धूल पैदा करने वाले अन्य कई उद्योग षामिल हैं, से बुंदेलखंड क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन को और बल मिल रहा है। मध्यप्रदेष सरकार ने सागर में हुए निवेषक सम्मेलन के जरिए बुंदेलखंड के बेहतर भविष्य का वादा जरूर किया था लेकिन राज्य की प्राथमिकता सूची में कृषि अभी भी काफी नीचे है। बुंदेलखंड क्षेत्र पारंपरिक तौर पर मध्यप्रदेष के सर्वाधिक संपन्न क्षेत्रों में माना जाता रहा है। इस क्षेत्र में घरेलू जरूरतों के अलावा बाजार के लिए भी पीढ़ियों से भरपूर खाद्यान्न उत्पादन होता रहा है। लेकिन पिछले आठ सालों में यह उत्पादन लगातार नीचे की ओर गिर रहा है। आज हाल यह है कि इस क्षेत्र की उत्पादन क्षमता घटकर लगभग आधी रह गई है। उधर, राज्य प्रषासनिक तंत्र कृषि क्षेत्र में हो रही इस असफलता के कारण ढूंढकर उनका निदान करने की बजाय औद्योगीकरण तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को न्यौता देकर यहां के प्राकृतिक संसाधनों के ज्यादा से ज्यादा दोहन कराने में जुटा हुआ है।

एक ओर जहां दिन प्रति दिन इस क्षेत्र के लोगों की हालत खराब होती जा रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार इस बात के लिए अपनी पीठ थपथपा रही है कि उसने बुंदेलखंड में निजी कंपनियों से करीब 50 हजार करोड़ रुपए के निवेष के लिए सफलता हासिल की है। यह बात गौरतलब है कि इनमें से ज्यादा निवेषकों का ध्यान खनन आधारित उद्योगों पर है। मसलन, स्टील प्लांट, सीमेंट प्लांट, जैट्रोफा उत्पादन, प्रसंस्करित खाद्य उत्पाद आदि। आर्थिक विकास के ये तरीके पर्यावरण के लिये बेहद नुकसानदायक हो सकते हैं। राज्य सरकार इन निवेषकों को पानी, बिजली और तमाम अन्य सुविधाएं देने का वायदा कर रही है। लेकिन इनमें से कृषि क्षेत्र के लिए एक भी निवेष नहीं किया गया है। यहां होने वाले औद्योगीकरण से जमीनों की उर्वरता घटेगी, भूजल के अंधाधुंध दोहन से अपने उत्पादन और जंगलों के प्रसिध्द बुंदेलखंड की जमीन बंजर हो जाएगी। इसके चलते यहां के किसान, गरीब और उपेक्षित समुदाय असुरक्षा के अनुत्तरित सवालों के साथ अकेले छूट जाएंगे।

जलवायु परिवर्तन और बुंदेलखंड



परीकथा नहीं है जलवायु परिवर्तन


सचिन कुमार जैन

हर बार की तरह पिछली बार भी गौरीषंकर ने पान की फसल 18 कतारों में लगाई थी। लेकिन इस बार वह किस्मत की बाजी हार गया। वह बताता है, हर साल वह 20 फरवरी से 20 मार्च के बीच पान की फसल लगाता आया है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि फसल खूब लहलहाए और ढेर सारी कमाई दे। इसके लिए जरूरी है कि फसल को कम से कम तीन महीने तक तीखी धूप से बचाकर रखा जाए। फसल को मिलने वाला तापमान 30 डिग्री से ज्यादा नहीं होना चाहिए। इसी लिए इस इलाके के किसान फसल के क्षेत्र को टहनियों और धान के पैरे से बनाए अस्थायी ढांचे से ढंक देते हैं। लेकिन गौरीषंकर की व्यथा कुछ और ही है। वह कहता है कि जब उसने फसल लगाई वह सीजन पान लगाने वाला ही था लेकिन तब तापमान बढ़कर 35 डिग्री हो चुका था। यहां पान उत्पादक किसान तापमान जानने के लिए किसी वैज्ञानिक उपकरण का इस्तेमाल नहीं करते। वे अपने हाथों को सूरज की ओर फैलाकर या नंगे पैर जमीन पर चलकर पता कर लेते हैं कि कितनी गर्मी है। वर्तमान मौसमी संकेत अगले साल खूब गरम होने की चेतावनी दे रहे हैं। ऐसी स्थिति अब तक कभी भी नजर नहीं आई थी। ताजा स्थितियों में मध्य और उत्तारी भारत ठोस जाड़े के मौसम में वातावारण गर्मी से तप रहा है।
मध्यप्रदेष के बुंदेलखंड क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का सीधा असर देखा और महसूस किया जा सकता है। यह एक अहम अनाज उत्पादक इलाका रहा है पर यहां पिछले सात सालों में इसके चलते किसानों व पान उत्पादकों का जिंदगी बदल कर रख दी है। जलवायु परिवर्तन ने यहां कृषि आधारित आजीविका और खाद्यान्न उत्पादन पर खासा असर डाला है। बुंदेलखंड के जिलों में खाद्यान्न में 58 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। निष्चित तौर पर यह कृषि आधारित समाज तथा उसकी आर्थिक स्थिति के लिए बेहद गंभीर बात है। मध्यप्रदेष के बुंदेलखंड क्षेत्र में कृषि क्षेत्र में नाकामी अब एक चक्रीय परिघटना बन चुकी है।
बुदेलखंड के लोगों पर जलवायु परिवर्तन का सीधा और गहरा असर साफ महसूस किया जा सकता है। यहां पिछले आठ सालों में मानसून की अवधि साल में 52 दिन से घटकर अब महज 24 दिन की रह गई है।
रामपाल सिंह बताते हैं कि निवारी और टीला गांवों में इतनी ज्यादा सब्जियां पैदा होती थीं कि यहां सब्जी उनके लिए बेहद मामूली चीज हो गई थी। यहां हर किसी की थाली में गेहूं, दाल, चना व सब्जियां पर्याप्त मात्रा में देखी जा सकती थीं। लेकिन यहीं हालात कुछ इस कदर बदले कि पिछले चार-पांच सालों से वह अपनी 40 बीघा जमीन पर लौकी, ककड़ी या आलू की फसल तक नहीं ले पाए हैं। अब उन्हें खाने की सब्जियों के लिए भी बाजार का मुंह ताकना पड़ता है। रामपाल ने पिछले साल अपने किसान क्रेडिट कार्ड से इस भरोसे पर कर्ज लिया था कि अच्छी फसल के होते ही वह कर्ज चुकता कर देगा। लेकिन अभी तक वह कर्ज की एक भी किष्त नहीं चुका पाया है।
पिछले चार-पांच सालों में बेहद कम पानी बरसने या कई क्षेत्रों में सूखा पड़ने के चलते इस क्षेत्र के तकरीबन सभी कुएं सूख चुके हैं।
बुदेलखंड के लोगों पर जलवायु परिवर्तन का सीधा और गहरा असर साफ महसूस किया जा सकता है। यहां पिछले आठ सालों में मानसून की अवधि साल में 52 दिन से घटकर अब महज 24 दिन की रह गई है।
यहां आंगनवाड़ी केंद्रों द्वारा गांवों में मुहैया कराए जा रहे पोषाहार योजना पर भी नकारात्मक असर पड़ा है, क्योंकि पानी के अभाव में पोषाहार को पकाना एक समस्या बन गया है। अगर ग्रामीण अपने गांवों में ही रुके भी रहें तो उन्हें सूखे की मार झेलनी पड़ती है।
बुंदेलखंड के ज्यादातर गांवों के लोग अब आसपास के षहरों के लिए पलायन करने लगे हैं ताकि वे गुजर-बसर के लिए कोई काम कर सकें। इसके चलते उनके बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ गया है। उनके मुताबिक उनके बच्चों के भोजन का एक बड़ा हिस्सा स्कूलों के मध्यान्ह भोजन व आंगनवाड़ी के मिलने वाले पोषाहार के रूप में पहले गांवों में मिल जाया करता था। लेकिन बुंदेलखंड में पड़ रहे सूखे ने इन गांवों में लोगों की आजीविका का आधार ही हिला कर रख दिया है। खासकर जल आपूर्ति और कृषि के अभाव में किसी और तरह की गतिविधि यहां संभव ही नहीं रह गई है।