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Friday, December 04, 2009

जलवायु परिवर्तन, कोपनहेगन

जलवायु परिवर्तन, कोपनहेगन और हम


सचिन कुमार जैन

भारत की सरकार ने अपनी नीति जरूर तय कर ली कि वह सन् 2020 तक 25 प्रतिशत और 2037 तक 37 प्रतिशत कटौती कार्बन उत्सर्जन में करेगा; परन्तु इस नीति को तय करने में लोकतांत्रिक नहीं बल्कि आर्थिक-राजनीतिक रणनीति अपनाई गई। भारत के पर्यावरण मंत्री ने भारत की संसद को सूचित किया कि हम कोपनहेगन में अपने इन लक्ष्यों को सामने रखेंगे परन्तु सवाल यह है कि इन लक्ष्यों पर संसद में बहस क्यों नहीं हुई, जन प्रतिनिधियों को खुलकर जलवायु परिवर्तन और कोपनहेगन की राजनीति के बादे में क्यों नहीं बताया गया? इसका दुष्परिणाम यह होगा कि जब इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिये सरकार नीतियां और व्यवस्था बनायेगी तब उसे देष के भीतर राजनैतिक-सामाजिक और आर्थिक सहयोग नहीं मिलेगा। भारत सरकार केवल लक्ष्य तय करके अपना दायित्व पूरा नहीं कर सकती है बल्कि उसे स्पष्ट रूप से यह बताना चाहिये कि कार्बन गैसों के उत्सर्जन में इतनी कमी कौन से उद्योगों, कार्यषालाओं और क्षेत्रों से की जायेगी? सरकार को यह समझना होगा कि उसे दबाव में तो रहना ही है, तय यह करना है कि यह दबाव किसका होगा अमेरिका का या भारत के लोकतंत्र का !!
जलवायु परिवर्तन न तो नये जमाने का नया मुद्दा है न ही कोई काल्पनिकता। इस मुद्दे की गर्मी को कई सालों पहले ही महसूस किया जा चुका था। 1972 में रियोडिजेनेरो में हुये विश्व पृथ्वी सम्मेलन के बाद क्योटो और बाली होते हुये हमारी सरकारें कोपनहेगन तक पहुंच चुकी हैं परन्तु इन 37 सालों के बाद भी कार्बन और मीथेन जैसी खतरनाक गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। मालदीव की सरकार समुद्र के भीतर और नेपाल की सरकार हिमालय के तल में बैठकर अपने खत्म होते अस्तित्व पर चीत्कार कर रही है और विकासशील देश विकास के दुराचार में लगे हुये हैं। जलवायु परिवर्तन पर यूं तो पहला वैश्विक समझौता सन् 1997 में जापान से क्योटो शहर में हुआ था पर अमेरिका जैसे देशों के जिद्दीपन के कारण यह 16 फारवरी 2005 को लागू हो पाया। इस प्रोटोकाल की अवधि सन् 2012 में खत्म हो रही है इसलिये कोपनहेगन में एक सर्वमान्य समझौता होना एक अनिवार्यता बन गई है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले कुछ सालों में मालदीव जैसे समुद्री तटवर्ती देश बढ़ते जल स्तर, पिघलते ग्लेषियरों के कारण समुद्र में डूब जायेंगे; मतलब साफ है जलवायु परिवर्तन का संकट गले तक पहुंच चुका है।
सन् 1989 में पहली बार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इस सवाल पर समझौते की आधारशिला रखी गई थी और सन् 2009 तक आते-आते जलवायु परिवर्तन का यह सवाल हर जिन्दगी का सवाल बन गया। इसके साथ ही यह वैश्विक आर्थिक राजनीति का केन्द्रीय रणक्षेत्र भी। सैद्धांतिक तौर पर यह माना जाता है कि कार्बन डाई आक्साईड, मीथेन और इसके जैसी अन्य गैसों (जिन्हें ग्रीन हाउस गैस कहा जाता है) के बहुत ज्यादा पैदा (उत्सर्जन) होने के कारण वैश्विक और स्थानीय जलवायु के चक्र और चरित्र में परिवर्तन आता है। इससे कहीं खूब गर्मी पड़ रही है तो कहीं बाढ़ आ रही है और कहीं सूखा अब बार-बार पड़ रहा है। मौसम के चक्र और चरित्र में आ रहे परिवर्तन से आजीविका, स्वास्थ्य, पर्यावरण के ही नहीं बल्कि दुनिया के अस्तित्व के भी सवाल खड़े हो रहे हैं। दुनिया भर की सरकारें अब इस दबाव में हैं कि इस संकट की रफ्तार को धीमा किया जाये। यह एक साधारण मसला नहीं है। जलवायु परिवर्तन का सबसे मूल कारण हमारे विकास का ढांचा और परिभाषा है। जिस तरह के पूंजीवादी केन्द्रीयकृत पर्यावरणविरोधी औद्योगिकीकरण और आर्थिक विकास की नीतियों को दुनिया की सरकारें प्रोत्साहन देती रही हैं उसी से ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन बढ़ा और जलवायु परिवर्तन की चुनौती ने विकराल रूप लिया। इसका सबसे अहम् हल यह माना जाता है कि दुनिया किसी भी तरह से इन गैसों की पैदावार कम करे। क्योटो प्रोटोकाल के तहत यह तय किया गया था कि पूरी दुनिया में दो तरह के देष हैं जो इन गैसों का ज्यादा उत्पादन करते हैं उसे अपने विकास की नीतियों को बदलकर ग्रीन हाऊस गैसों की वृध्दि को रोककर 20 साल पहले के स्तर पर लाना चाहिये। परन्तु ऐसा हुआ नहीं इन देशों ने अपने गैसों के कारखाने बनाये रखे और इन गैसों की मात्रा में 14 फीसदी की बढ़ोत्तारी हो गई। दूसरे तरह के वे देश हैं जो विकासशील हैं, वे गैस का कम उत्सर्जन कर रहे हैं उन्हें अपने विकास का अधिकार मिलना चाहिये; यानि जलवायु परिवर्तन के नाम पर विकासशील देशों को पिछड़ा बने रहने का अभिशाप नहीं भोगना चाहिये। यह तय हुआ कि ऐसे देशों के विकास के लिये विकसित देश मदद भी करेंगे। कई वर्षों से इस पर राजनीति शुरू हुई और अब खूब आगे तक जा चुकी है। राजनीति इसलिये क्योंकि जलवायु परिवर्तन के मामले में ईमानदार कदम उठाने का मतलब है अपने विकास की दर को कम करने का निर्णय लेना। सरकारों को अपनी कई ऐसी नीतियों और योजनाओं को बदलना होगा जो एक तरफ तो उनका औद्योगिक विकास कर रही हैं परन्तु दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन की कारण् भी हैं। कई या कहें कि ज्यादातार देश इस मामले पर ईमानदार नहीं हुये। अब दिसंबर 2009 में कोपनहेगन में फिर लोग इकट्ठा हुये। यह क्योटो के बाद दूसरी बड़ी बैठक है। जिसमें राजनीति की दिशा तय हुई। क्योटो के बाद कोपनहेगन तक जलवायु परिवर्तन की राजनीति बेहद संवेदनशील हो गई है। क्योंटो में ग्रीम हाऊस गैस ज्यादा पैदा करने वाले और कम या न पैदा करने वाले देश अलग-अलग पहचान रखते हैं।
कोपनहेगन तक आते-आते दोनों तरह के देशों को एक ही सूची में रख दिया गया। अब दबाव बनाया जा रहा है कि अमेरिका (जो दुनिया की 22 प्रतिशत गैस पैदा करता है) और भारत (जो दुनिया की 4 प्रतिशत गैस पैदा करता है) बराबरी से इन गैसों के उत्सर्जन में कमी लायें। कई सालों तक भारत ने यह नीति अपनाई की हम जिम्मेदार हैं पर हम अपने विकास के अधिकार पर समझौता नहीं करेंगे और दूसरे देशों के द्वारा किये गये अपराधों की सजा भी नहीं भुगतेंगे। इसलिये भारत चाहता था कि विकसित देश अपनी नीतियां और विकास का तरीका बदलें। इस नीति के कारण भारत पर खूब दबाव पड़ा और उसे बाध्य किया गया कि वह भी कार्बन गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने का वायदा करे और अंतत: कोपनहेगन की बैठक के ठीक पहले भारत को यह मानना पड़ा कि वह सन 2020 तक कार्बन गैसों के उत्सर्जन में 25 प्रतिशत की कटौती लाने का प्रयास करेंगा; पर वह कानूनी रूप से बाध्य नहीं होगा। राजनीति के नजरिये से यह एक दबाव में लिया गया निर्णय है किन्तु जवाबदेहिता के नजरिये से शायद सही निर्णय भी है। अब भारत जैसे देशों को यह करना होगा कि दुनिया के विकसित देश भी इस जवाबदेहिता को समझें इसके लिये हमें दबाव की राजनीति की दिशा को पलटना होगा। वास्तव में जलवायु परिवर्तन पर एक नजरिया बनाने के लिये विकास की परिभाषा और प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने की सबसे बुनियादी जरूरत है।
आईपीसीसी के अध्यक्ष आर.के. पचौरी कहते हैं कि हमारे खान-पान की बदलती संस्कृति ने भी जलवायु परिवर्तन में बड़ी भूमिका निभाई है। मांस के उपभोग को इसमें शामिल माना जाये। एक किलो मक्का के उत्पादन में 900 लीटर पानी लगता है परन्तु भैंस के 1 किलो मांस के उत्पादन में 15,500 लीटर पानी की जरूरत होती है। पशुधन को अब केवल मांस के नजरिये से और कृषि, पर्यावरण और आजीविका के नजरिये से कम देखा जाता है। दुनियाभर के अनाज उत्पादन का एक तिहाई का उपयोग मांस के लिये जानवर पालने में होता है। एक व्यक्ति एक हेक्टेयर खेती की जमीन से सब्जियां, फल और अनाज उगाकर 30 लोगों के लिये भोजन की व्यवस्था कर सकता है किन्तु अगर इसी का उपयोग अण्डे, मांस, जानवर के लिये किया जाता है तो केवल 5 से 10 लोगों का ही पेट भर सकेगा। 1 किलो पोल्ट्री मांस के उत्पादन के लिये 2.1 से 3 किलो खाद्यान्न का उपयोग होता है। बात साफ नजर आती है कि नीतियों के साथ-साथ व्यवहारों में भी बदलाव अब एक अनिर्वायता बन चुका है। दुखद यह है कि जीवन शैली में बदलाव की जरूरत अब भी छिपाई जा रही है। इन्टर गवर्नमेंटल पैनल आन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की चौथी आंकलन रिपोर्ट यह साफ तौर पर उल्लेखित करती है कि दुनिया के लोगों को अपनी जीवनषैली में भी बदलाव करना होगा। यह भी कम कठिन बदलाव नहीं होगा क्योंकि मौजूदा समाज विलासिता और आराम तलबी के जीवन में गुम चुका है। उसे यह विश्वास करना होगा कि उपभोक्तावादी व्यवहार भी जलवायु परिवर्तन के मूल कारणों में से एक है और इसे बदलना ही होगा। मंहगाई और उत्पादन में कमी ने भुखमरी को व्यवस्था की स्थाई समस्या बना दिया है। इसके पीछे उत्पादन की अनियोजित व्यावसायिकता घिनौना खेल खेल रही है, हमें इस पूंजीवादी राजनीति को समझना होगा।

न तो सूरज ने कम की है अपनी गर्मी
न बादलों ने बेंच दिया अपना पानी
हवा भी अपनी चाल से चलती है
मौसम नही हुआ है बेवफ़ा,
पर बदल दी है तुम्हारी जिन्दगी
तुम्हारी ही राजनीति ने
और तोड़ दिया है भरोसे का चक्र!!

Thursday, April 23, 2009

जलवायु परिवर्तन

चुनावी जंग में

जलवायु परिवर्तन

के सवाल


सचिन कुमार जैन


गुरूवार, अप्रैल 23, 2009,2:51 [IST]
नई दिल्ली , 23 अप्रैल (आईएएनएस)। दुनिया में बदलते मौसम का असर अब देश के विभिन्न इलाकों पर भी दिखने लगा है। पश्चिम बंगाल के सुंदरवन भारत के सबसे सघन वनों और जैव विविधता वाले वन रहे हैं, वहां विगत 10 वर्षो में जमीन समुद्र के बढ़ते जल स्तर के कारण खारेपन की शिकार हो गई और खेती बर्बाद। राजस्थान में एक रेगिस्तानी गर्म इलाके की व्यवस्था है, वहां बाड़मेर में लगातार वर्षा के कारण बाढ़ आ रही है।
मध्य प्रदेश में खाद्यान्न उत्पादन में 10 से 20 फीसदी और उत्पादकता में 20 फीसदी तक कमी आई है। और पिछले 15 वर्षो से हर साल सूखा पड़ रहा है। मछुआरों की आजीविका लगभग खत्म हो रही है। हड़प्पा-मोहन जोदड़ो की सभ्यता जलवायु परिवर्तन के कारण ही खत्म हुई है।
मौसम में बढ़ती गर्मी, सूखते बादल और हवाओं का बदलता रूख अब हमारे अस्तित्व का सवाल बन रहा है। जलवायु परिवर्तन का असर महज शोध और अध्ययन का विषय नहीं माना जाना चाहिए। यह हमारी जिन्दगी पर सीधा असर डाल रहा है। इससे बीमारियां, महंगााई और मौतें बढेंगी, फिर धरती का सौंदर्य खत्म हो जाएगा।हालांकि आज के चुनावी दौर में प्रचार मंचों पर राजनैतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोपों और छिछले वक्तव्यों के बीच कुछ बेहद अहम और बुनियादी मसले खो से गए हैं लेकिन 15 वीं लोकसभा का चुनाव एक मायने में महत्वपूर्ण माना जाएगा कि इस मर्तबा भारत की तमाम राजनैतिक विचारधाराओं ने पहली बार जलवायु परिवर्तन के संकट को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया है।
अब छिछलापन अभिव्यक्ति के अधिकार में औपचारिक रूप से शामिल होता नजर आ रहा है। पहले कुछ विशेष मामलों में घर्षण नजर आता था, अब यह राष्ट्रीय चरित्र बन रहा है। अब इससे सकल धरेलू उत्पाद वृद्घि में 7 से 11 प्रतिशत कमी आ रही है। फिर भी उम्मीद है, इसके संकेत हमें मिल चुके हैं। अब से कुछ समय पहले तक पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन का सवाल केवल संयुक्त राष्ट्र संघ, कुछ विद्वानों या फिर गिनी चुनी संख्याओं का शगल माना जाता रहा किन्तु 15 वीं लोकसभा के राष्ट्रीय पर्व में यह एक चुनावी मसला तो बन ही गया।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)एक वैचारिक धरातल पर बात करते हुए कह रही है कि वह विकास के लिए स्थाई पारिस्थितिकीय मार्ग का अनुसरण करेगी जो जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार ग्रीन हाउस गैर उत्सर्जन कम करते हैं। और एक, निम्न कार्बन वाली अर्थव्यवस्था का निर्माण करके इस संकट का शमन करने का अवसर है।भाजपा ने जलवायु परिवर्तन के नियंत्रण को समुचित महत्व देने का वायदा किया। इसके लिए ऊर्जा पद्वतियों पर काम, पारम्परिक वर्ष सिंचित फसलों को बढ़ावा देने वाली बाते हैं। इसमें दो संकट हैं पहला तो वे इस नीति में विश्वास करते हैं कि हम विकसित देशों से आर्थिक मदद लेकर कार्बन ट्रेडिंग करें और जंगलों से वन्यप्राणी संरक्षण के नाम पर मानव समाज की बेदखली को ज्यादा बढ़ाएंगे। आश्चर्य है कि भाजपा ने जीवनशैली में बदलाव पर जोर नहीं दिया है।
वह जलवायु परिवर्तन के बहाने सामाजिक वानिकी, निजी भागीदारी को बढ़ावा देने की पहल करना चाहेगी। इससे संसाधनों पर राज्य-निजी क्षेत्र का नियंत्रण बढ़ेगा। भाजपा ने हिमालय के ग्लेशियर को संरक्षण करने की बात की है परन्तु वह चुकी बढ़े बांधों की हिमायती है इसलिए संभव है कि गंगा के उद्गम से ही बांधों की प्रक्रिया को वह तेजी से बढ़ाएगी इसमें वहां से निकलने वाली नदियां, जैसे- गंगा, मर जाएगी।
कांग्रेस अपने विकास के उस मामले को किसी भी तरह से बदलना नहीं चाहती है, जिससे जंगल और प्राकृतिक संसाधनों का विनाश तो हो ही रहा है, बदलते जीवन व्यवहार से उष्मीकरण (गर्मी) बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के लिये बनी राष्ट्रीय कार्ययोजना को आगे बढ़ाएगी। इसमें लोगों की आकांक्षाएं और आर्थिक विकास दोनों को तवज्जो दी जाएगी। मुश्किल यह है कि समाज के व्यवहार को भी हमारी सरकारों ने बदल दिया है, और विलासिता आधारित सेवाएं ही लोगों की आकांक्षाओं के रूप में परिभाषित की जा रही हैं, खासतौर पर कांग्रेस द्वारा। बस मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी इस मसले पर शांत दिखी।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कुल 7 पंक्तियां इस मसले पर लिखी हैं परन्तु सबसे गहरी और बुनियादी बातें इसमें ही हैं। वह कहती है कि हमें अपने और दुनिया के हितों में घातक उत्सर्जन को कम करना चाहिए पर भारत को दुनिया के कुछ अन्य देशों द्वारा पर्यावरण को पहुंचाए गए ऐतिहासिक नुकसान की भरपाई करने के दबाव से मुक्त होना चाहिए। विकसित और पूंजीवादी देश चाहते हैं कि भारत आर्थिक मदद देकर यहां कार्बन का व्यापार किया जाए, इस तरह की योजनाओं को समूल नष्ट करना होगा।
तमिलनाडु की द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टी होते हुए भी राष्ट्रीय राजनीति को हमेशा प्रभावित करती रही है। इनके घोषणा पत्र में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन पर हम काम को और आगे बढ़ाएंगे। वन एवं पर्यावरण के विषय संविधान की समवर्ती सूची मे हैं इसलिये राज्य सरकार इसमें कानून नहीं बना सकती है, ऐसे में केन्द्र सरकार यदि कोई कार्यक्रम बनाती है या अनुबंध करती है तो उसे राज्य सरकार से सहमति-संवाद के बाद ही उन्हें अंतिम रूप देना चाहिए, बहरहाल हम केन्द्र सरकार पर दबाव बनाते रहेंगे।
जयललिता की ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) ने इस विषय पर एक भी शब्द नहीं कहा है। बहुजन समाज पार्टी घोषणा पत्र जारी नहीं कर रही है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने जिन्हें देश के लिये अहम मुद्दे माना है उनमें से आधे से ज्यादा केवल आर्थिक और आर्थिक मंदी से जुड़े हैं पर्यावरण, सामाजिक न्याय और जलवायु परिवर्तन नहीं।
समग्रता में देखा जाये तो जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में विचारों और व्यवहारों में बड़ा अंतर देखा जा सकता है। लगातार ऐसी वस्तुओं और साधनों को सस्ता बनाया गया है जो हमें आराम तो देती हैं पर पर्यावरण का सत्यानाश करती हैं। उन्हें सीमित करने के बजाये सरकारें उन्हें बढ़ावा देती रही। औद्योगिकीकरण और शहरीकरण ने जैव विविधता और प्राकृतिक व्यवस्था को लगभग ध्वस्त कर दिया है और पिछले 9 वर्षो में भारत का ग्रीन हाउस उत्सर्जन में योगदान दोगुना हो गया है, हांलाकि अब भी यह अमेरिका से 76 फीसदी कम उत्सर्जन करता है।
वर्तमान विकास की परिभाषा और नीतियों से जलवायु परिवर्तन होगा ही जो अब कैंसर, मलेरिया, कोलरा, तपेदिक, तनाव और श्वांस की बीमारियों में बेतहाशा वृ़िद्घ करेगी। इससे समाज पर दोहरा बोझ बढ़ेगा क्योंकि अब स्वास्थ्य सेवाएं भी खुले बाजार में हैं सरकारें इन बीमारियों को पैदा करके स्वास्थ्य सेवाओं के व्यापारियों के लिए नए शिकार पैदा कर रही है। बहरहाल दुखद यह है कि जो विचार और वायदे कांग्रेस, भाजपा, वामपंथी सहित कुछ दलों ने अपने घोषणा पत्रों में दर्ज किए हैं उन्हें लोगों (जिन्हें हम मतदाता कहते हैं) तक पहुंचाने की कोई जद्दोजहद नजर नहीं आई।
जलवायु परिवर्तन के मसले पर गंभीर काम करने की अगर मंशा है तो जरुरूरत थी कि तमाम राजनैतिक दल पहले विकास की परिभाषा की समीक्षा करते क्योंकि खदानों, तकनीकों के असीमित विस्तार, जंगलों की कटाई, कार्बन पैदा करने वाले यंत्रों के बढ़ते उपयोग (फ्रिज, एसी, कम्प्यूटर, मोबाइल आदि) ने पर्यावरण के चक्र को झकझोर कर रख दिया है।
ऐसा साफ दिखता है कि सत्ता में कोई भी राजनैतिक दल आए, नीतियां और विकास की योजनाएं वहीं रहेंगी जो पिछले 20 सालों से चल रही है। यह केवल राजनैतिक व्यवस्था पर ही सवाल नहीं है बल्कि लोकतंत्र के कमजोर होने का संकेत है।
इसका मतलब यह भी है कि वास्तव में प्राथमिकताएं तो सरकार मे वही महत्वपूर्ण मानी जाती है, जो सत्ता को प्रभावित करने वाले वर्ग बना रहे हैं। इसमें बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और पूंजी के प्रबंधक अहम भूमिका में हैं। जिन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता है कि कौन सत्ता में आ रहे हैं। देश की पूंजीपतियों की सस्था सीआईआई ने कहा भी कि भारत के चुनावों का 50 फीसदी खर्च तो हम उठाते है। जो वह नहीं कहें कि इसका मतलब यह है कि सरकारें वही करेंगी जो हमें चाहिए। मुश्किल यह भी है कि इस मुद्दे को सामाजिक न्याय का मुद्दा नही माना जा रहा है। बेहद जरूरी है कि जलवायु अंकेक्षण (क्लाइमेट आडिट) की व्यवस्था को राष्ट्रीय कार्ययोजना का हिस्सा बनाया जाए और हर वर्ष इसके कारणों पर श्वेत-पत्र जारी किया जाए। और इस संकट की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को समझ कर कदम उठाए जाए।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
(सचिन कुमार जैन विकास संवाद से जुड़े हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Tuesday, December 30, 2008

बुंदेलखंड में आजीविका की चुनौतियां


बुंदेलखंड में

जलवायु परिवर्तन और

आजीविका की चुनौतियां

सचिन कुमार जैन

अब बुंदेलखंड में मौसम का पूर्वानुमान लगा पाना बेहद मुष्किल हो गया है। पहले हम जलवायु पध्दति के आधार पर कृषि तथा पषुओं के लिए योजनाबध्द तरीके अपनाते थे। लेकिन अब हमारे बस में कुछ नहीं रहा। ठेठ गर्मियों में तूफान आते हैं और बारिष षुरू हो जाती है। वहीं मानूसन में बारिष के दर्षन तक नहीं होते। और षीत ऋतु में इतनी ज्यादा ठंड पड़ती है कि हमारी सब्जियां, गेहूं और दूसरी तमाम फसलें खराब हो जाती है। इस साल ठंड इतनी कम पड़ी कि खेती फिर संकट में आ गई है। यह कहना है कि मध्यप्रदेष के टीकमगढ़ जिले में रह रहे टीला गांव के किसानों के एक समूह का जो बीते कई सालों से यहां हो रहे जलवायु परिवर्तन की मार झेलने को अभिषप्त हैं। वर्तमान मौसमी संकेत अगले साल खूब गरम होने की चेतावनी दे रहे हैं। ऐसी स्थिति अब तक कभी भी नजर नहीं आई थी। ताजा स्थितियों में मध्य और उत्तारी भारत ठोस जाड़े के मौसम में वातावारण गर्मी से तप रहा है।

चार साल बाद इस साल हमनें यहां बारिष देखी। लेकिन जून के दूसरे सप्ताह में ही हमारे क्षेत्र मौसम की करीब 32 फीसदी बरसात हो चुकी थी। लेकिन किसान इतनी जल्दी फसल बोने के लिए तैयार नहीं थे। बुंदेलखंड के ज्यादातर हिस्से में इस साल षुरू में ही सालाना बारिष का करीब 55 फीसदी हिस्सा बरस चुका था। यूं तो रिकार्ड के मुताबिक छतरपुर में 968.8 मिलीमीटर के मुकाबले 1108.3 मिलीमीटर वर्षा हो चुकी है यानी औसत से ज्यादा; इसके आधार पर अब बुन्देलखण्ड के छतरपुर के ज्यादातर जिले सूखे की सरकारी परिभाषा से ही बाहर हैं किन्तु यहीं के राजनगर विकासखण्ड के ललपुर, गुन्चू और प्रतापपुरा जैसे 40 से ज्यादा गांवों को पानी की तरावट नसीब नहीं हुई है। यहां चारे, बिजली और सिंचाई के साधनों का भी संकट है, पर अभी वहां कोई राहत नहीं पहुंचेगी। मौसम के इस बदलाव से कई इलाकों में बाढ़ आई और उर्वर जमीन के क्षय के साथ-साथ पषुओं का भी बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ। बुंदेलखंड में कृषि की इस बदहाली का असर यहां के पषुओं पर भी साफ तौर पर देखा जा सकता है।

प्रभावित क्षेत्र के ज्यादातर परिवारों ने या तो सूखे के असर के चलते अपने पषु गंवा दिए या फिर उनके अपनी किस्मत के भरोसे खुला छोड़ दिया गया। यहां लोग अपने और परिवार की जिंदगी के लिए हर दिन नई चुनौती से जूझ रहे थे, अपने पषुओं के बारे में सोचना उनके लिए काफी दूर की चीज थी। विगपुर के हकीम सिंह यादव के पास कभी 37 जानवर हुआ करते थे, अब वे काफी दुख के साथ बताते हैं कि उनके पास केवल 7 जानवर ही बचे हैं। जलवायु के इस अनिष्चित रवैये के चलते क्षेत्र में हुई पर्याप्त बारिष भी यहां की खेती के लिए कोई फायदा नहीं पहुंचा पाई। छतरपुर व पन्ना जिलों में भी इस असमान बारिष की मौजूदगी जरूर महसूस की गई लेकिन बीते 15 सालों से जारी सूखे तथा जंगलों के कटने के चलते बारिष के पानी को बटोरने तथा भविष्य के लिए इस्तेमाल करने की क्षमता भी बेहद सीमित नजर आई।

हाल के कुछ वर्षों में पूर्वी मध्यप्रदेष सूखे की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। वास्तव में पिछले साल (2007-08) तो करीब 39 जिले सूखा प्रभावित घोषित कर दिए गए थे, इनमें से ज्यादातर बुंदेलखंड क्षेत्र में ही थे। इस साल (2008-09) सूखे का असर पष्चिमी मध्यप्रदेष की ओर बढ़ गया है और करीब 21 जिले सूखा प्रभावित (वे जिले जहां बारिष -20 से -59 फीसदी तक कम हुई हो) के रूप में पहचाने जा चुके हैं। इन सात जिलों, छिंदवाड़ा, देवास, हरदा, होषंगाबाद, सीहोर, खरगौन तथा पन्ना में औसत की तुलना में करीब 40 फीसदी कम बरसात हुई है। इससे पता चलता है कि समूचा मध्यप्रदेष ही धीरे-धीरे सूखा प्रभावित भौगोलिक क्षेत्र बनता जा रहा है।

मध्यप्रदेष की नई नीतियों व तथाकथित विकास योजनाओं, जिनमें खनन, सीमेंट उत्पादन व धूल पैदा करने वाले अन्य कई उद्योग षामिल हैं, से बुंदेलखंड क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन को और बल मिल रहा है। मध्यप्रदेष सरकार ने सागर में हुए निवेषक सम्मेलन के जरिए बुंदेलखंड के बेहतर भविष्य का वादा जरूर किया था लेकिन राज्य की प्राथमिकता सूची में कृषि अभी भी काफी नीचे है। बुंदेलखंड क्षेत्र पारंपरिक तौर पर मध्यप्रदेष के सर्वाधिक संपन्न क्षेत्रों में माना जाता रहा है। इस क्षेत्र में घरेलू जरूरतों के अलावा बाजार के लिए भी पीढ़ियों से भरपूर खाद्यान्न उत्पादन होता रहा है। लेकिन पिछले आठ सालों में यह उत्पादन लगातार नीचे की ओर गिर रहा है। आज हाल यह है कि इस क्षेत्र की उत्पादन क्षमता घटकर लगभग आधी रह गई है। उधर, राज्य प्रषासनिक तंत्र कृषि क्षेत्र में हो रही इस असफलता के कारण ढूंढकर उनका निदान करने की बजाय औद्योगीकरण तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को न्यौता देकर यहां के प्राकृतिक संसाधनों के ज्यादा से ज्यादा दोहन कराने में जुटा हुआ है।

एक ओर जहां दिन प्रति दिन इस क्षेत्र के लोगों की हालत खराब होती जा रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार इस बात के लिए अपनी पीठ थपथपा रही है कि उसने बुंदेलखंड में निजी कंपनियों से करीब 50 हजार करोड़ रुपए के निवेष के लिए सफलता हासिल की है। यह बात गौरतलब है कि इनमें से ज्यादा निवेषकों का ध्यान खनन आधारित उद्योगों पर है। मसलन, स्टील प्लांट, सीमेंट प्लांट, जैट्रोफा उत्पादन, प्रसंस्करित खाद्य उत्पाद आदि। आर्थिक विकास के ये तरीके पर्यावरण के लिये बेहद नुकसानदायक हो सकते हैं। राज्य सरकार इन निवेषकों को पानी, बिजली और तमाम अन्य सुविधाएं देने का वायदा कर रही है। लेकिन इनमें से कृषि क्षेत्र के लिए एक भी निवेष नहीं किया गया है। यहां होने वाले औद्योगीकरण से जमीनों की उर्वरता घटेगी, भूजल के अंधाधुंध दोहन से अपने उत्पादन और जंगलों के प्रसिध्द बुंदेलखंड की जमीन बंजर हो जाएगी। इसके चलते यहां के किसान, गरीब और उपेक्षित समुदाय असुरक्षा के अनुत्तरित सवालों के साथ अकेले छूट जाएंगे।

जलवायु परिवर्तन और बुंदेलखंड



परीकथा नहीं है जलवायु परिवर्तन


सचिन कुमार जैन

हर बार की तरह पिछली बार भी गौरीषंकर ने पान की फसल 18 कतारों में लगाई थी। लेकिन इस बार वह किस्मत की बाजी हार गया। वह बताता है, हर साल वह 20 फरवरी से 20 मार्च के बीच पान की फसल लगाता आया है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि फसल खूब लहलहाए और ढेर सारी कमाई दे। इसके लिए जरूरी है कि फसल को कम से कम तीन महीने तक तीखी धूप से बचाकर रखा जाए। फसल को मिलने वाला तापमान 30 डिग्री से ज्यादा नहीं होना चाहिए। इसी लिए इस इलाके के किसान फसल के क्षेत्र को टहनियों और धान के पैरे से बनाए अस्थायी ढांचे से ढंक देते हैं। लेकिन गौरीषंकर की व्यथा कुछ और ही है। वह कहता है कि जब उसने फसल लगाई वह सीजन पान लगाने वाला ही था लेकिन तब तापमान बढ़कर 35 डिग्री हो चुका था। यहां पान उत्पादक किसान तापमान जानने के लिए किसी वैज्ञानिक उपकरण का इस्तेमाल नहीं करते। वे अपने हाथों को सूरज की ओर फैलाकर या नंगे पैर जमीन पर चलकर पता कर लेते हैं कि कितनी गर्मी है। वर्तमान मौसमी संकेत अगले साल खूब गरम होने की चेतावनी दे रहे हैं। ऐसी स्थिति अब तक कभी भी नजर नहीं आई थी। ताजा स्थितियों में मध्य और उत्तारी भारत ठोस जाड़े के मौसम में वातावारण गर्मी से तप रहा है।
मध्यप्रदेष के बुंदेलखंड क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का सीधा असर देखा और महसूस किया जा सकता है। यह एक अहम अनाज उत्पादक इलाका रहा है पर यहां पिछले सात सालों में इसके चलते किसानों व पान उत्पादकों का जिंदगी बदल कर रख दी है। जलवायु परिवर्तन ने यहां कृषि आधारित आजीविका और खाद्यान्न उत्पादन पर खासा असर डाला है। बुंदेलखंड के जिलों में खाद्यान्न में 58 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। निष्चित तौर पर यह कृषि आधारित समाज तथा उसकी आर्थिक स्थिति के लिए बेहद गंभीर बात है। मध्यप्रदेष के बुंदेलखंड क्षेत्र में कृषि क्षेत्र में नाकामी अब एक चक्रीय परिघटना बन चुकी है।
बुदेलखंड के लोगों पर जलवायु परिवर्तन का सीधा और गहरा असर साफ महसूस किया जा सकता है। यहां पिछले आठ सालों में मानसून की अवधि साल में 52 दिन से घटकर अब महज 24 दिन की रह गई है।
रामपाल सिंह बताते हैं कि निवारी और टीला गांवों में इतनी ज्यादा सब्जियां पैदा होती थीं कि यहां सब्जी उनके लिए बेहद मामूली चीज हो गई थी। यहां हर किसी की थाली में गेहूं, दाल, चना व सब्जियां पर्याप्त मात्रा में देखी जा सकती थीं। लेकिन यहीं हालात कुछ इस कदर बदले कि पिछले चार-पांच सालों से वह अपनी 40 बीघा जमीन पर लौकी, ककड़ी या आलू की फसल तक नहीं ले पाए हैं। अब उन्हें खाने की सब्जियों के लिए भी बाजार का मुंह ताकना पड़ता है। रामपाल ने पिछले साल अपने किसान क्रेडिट कार्ड से इस भरोसे पर कर्ज लिया था कि अच्छी फसल के होते ही वह कर्ज चुकता कर देगा। लेकिन अभी तक वह कर्ज की एक भी किष्त नहीं चुका पाया है।
पिछले चार-पांच सालों में बेहद कम पानी बरसने या कई क्षेत्रों में सूखा पड़ने के चलते इस क्षेत्र के तकरीबन सभी कुएं सूख चुके हैं।
बुदेलखंड के लोगों पर जलवायु परिवर्तन का सीधा और गहरा असर साफ महसूस किया जा सकता है। यहां पिछले आठ सालों में मानसून की अवधि साल में 52 दिन से घटकर अब महज 24 दिन की रह गई है।
यहां आंगनवाड़ी केंद्रों द्वारा गांवों में मुहैया कराए जा रहे पोषाहार योजना पर भी नकारात्मक असर पड़ा है, क्योंकि पानी के अभाव में पोषाहार को पकाना एक समस्या बन गया है। अगर ग्रामीण अपने गांवों में ही रुके भी रहें तो उन्हें सूखे की मार झेलनी पड़ती है।
बुंदेलखंड के ज्यादातर गांवों के लोग अब आसपास के षहरों के लिए पलायन करने लगे हैं ताकि वे गुजर-बसर के लिए कोई काम कर सकें। इसके चलते उनके बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ गया है। उनके मुताबिक उनके बच्चों के भोजन का एक बड़ा हिस्सा स्कूलों के मध्यान्ह भोजन व आंगनवाड़ी के मिलने वाले पोषाहार के रूप में पहले गांवों में मिल जाया करता था। लेकिन बुंदेलखंड में पड़ रहे सूखे ने इन गांवों में लोगों की आजीविका का आधार ही हिला कर रख दिया है। खासकर जल आपूर्ति और कृषि के अभाव में किसी और तरह की गतिविधि यहां संभव ही नहीं रह गई है।