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Wednesday, December 31, 2008

विकास

भूखे और प्यासे विकास पर सवाल

सचिन कुमार जैन

आज का दौर विकास सम्बन्धी विरोधाभासों का दौर है जिसमें एक ओर तो देष विकास एवं उन्नति का सफर तेजी से तय कर रहा है परन्तु दूसरी ओर पानी और भोजन की समस्यायें उसके सामने संकट का रूप लेकर आन खड़ी हुई हैं। तकनीकी रूप से होने वाली उन्नति के फलस्वरूप भारत के उत्पादन में विगत पचास वर्षों मे 5 गुना वृध्दि हुई है परन्तु सामाजिक स्तर पर लोगों के जीवन के अभाव को दूर करके उसकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में सफलता नहीं मिल पाई। यह सच है कि विकास की परिभाषा तय करते समय सत्ता और समाज ने आधुनिक और तकनीकी विकास की परिभाषा के पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को नजरंदाज किया। औद्योगिकीकरण को हर संभव प्रोत्साहन प्रदान किया गया और औद्योगिकीकरण ने लोकोन्मुखी चरित्र नहीं अपनाकर आर्थिक विकास पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। इस विकास का समर्थन करने वाला समूह कम लागत और अधिक लाभ के सिध्दान्त में कट्टर विष्वास रखने वाला समुदाय है। उसे इस बात का कोई फर्क नही पड़ता है कि मषानीकरण के कारण राज्य में हर वर्ष सवा दो लाख और देष में 63 लाख लोगों के लिये काम का संकट खड़ा हो रहा है। अब तक तो यह संकट मजदूरों तक सीमित था, जो अपना दायरा बढ़ाकर 1.67 लाख उच्च षिक्षित प्रोफषनल समूह के सामने समस्यायें खड़ी करने जा रहा है। 1980 के दषक में आखिरी वर्षों में कई कमियों के बावजूद आधुनिक विकास की उस अवधारणा को सामाजिक मान्यता दी गई, जो किसानों, मजदूरों और निम्न-मध्यम आय वर्ग के लोगों हितों के सर्वथा विपरीत थी। सूखे और बाढ़ के काल मे वह किसानों को आर्थिक अनुदान देकर मदद करने की पहल का विरोध करती थी, मजदूरों को वर्ष भर जरूरत के अनुरूप काम दिया जा सके, ऐसे प्रयासों को सरकार ने भी कभी तवज्जो नहीं दी। जरूरी केवल यह था कि एक्साईज डयूटी को कम किया जाये, आयात को सुगम बनाया जाये, देष में ऐसे उद्योगों को बढ़ावा दिया जाये जिनसे पूंजीपति वर्ग को असीमित लाभ हासिल होता रहे। इस वर्ष यूरिया और खाद पर कर लगाकर (हालांकि चुनावों के कारण यह अभी यह वापस ले लिया गया है पर अगले वर्ष लगने के बाद वापस नहीं होगा) सरकार ने भी यह सिध्द कर दिया है कि उनके लिए महत्वपूर्ण कौन है?
इस चर्चा का मुख्य उद्देष्य यह सिध्द करना है कि देष का समाज अब हर मामले में 'सरकार' पर निर्भर हो गया है और यह निर्भरता इस हद तक बढ़ गई है कि वह अपनी नाक पर बैठी मक्खी को उड़ाने के लिए भी नगर निगम के अमलों की अपेक्षा करता है। अब सरकार भी खोखले होते समाज की इस प्रवृत्ति का यथा संभव लाभ उठाने का प्रयास यदा-कदा करती रहती है। सरकार नीतियां बनाती है, पर नीति का लाभ क्या होगा और किसे होगा, यह प्रष्न दबाव बनाकर कभी नहीं पूछा जाता है और सरकार नीति को खत्म कर देती है तब यह नहीं पूछा जाता है कि कदम क्यों उठाया गया?
उदारीकरण और औद्योगिकीकरण से लोग भूख से मरने लगे तो सरकार ने लोगों को रोजगार का अधिकार देने के बजाय स्माजिक सुरक्षा योजनायें लागू कर दीं, फिर मरने वाले लोगों के लिये परिवार सहायता योजना लागू की और एक मुष्त दस हजार रूपये उन्हें दिये जाने लगे, अन्त्योदय योजना के अन्तर्गत दो रूपये किलो गेहूं दिया जाने लगा परन्तु ऐसी स्थितियों पैदा क्यों हुई कि 1993 से सन् 2000 के बीच सरकार को छह ऐसी योजनायें बनानी पड़ी जिनके अन्तर्गत सरकारी भिक्षावृत्तिा के समान मदद दी जाती है। यदि देष विकास कर रहा है तो बेरोजगारी भत्ताा बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? हकीकत यह है कि अधिकार सम्पन्न समूह अपनी ताकत को इस्तेमाल करके निहित स्वार्थों की पूर्ति कर रहा है। अब सामाजिक विकलांगता का राजनीति और सत्ता लाभ उठा रही है। यदि लोग गरीबी का सवाल उठाते हैं तो उन्हें 10 किलों सड़े अनाज या 75 रूपये का जवाब दे दिया जाये, देष के पांच करोड़ बेरोजगार रोजगार का सवाल उठाते हैं तो जवाब में उन्हें मिलता है 150 रूपये का बेरोजगारी भत्ताा। विडम्बना तो यह है जब यह भत्ता 150 रूपये से बढ़कर 300 रूपये हो जाता है तो युवा वर्ग सत्ताा और राजनीति की जय-जयकार करते हुये अपने शोषकों के समक्ष नतमस्तक हो जाता है पर सवाल नहीं उठाता है। 57 वर्र्ष पहले जब देष स्वतंत्र हुआ था तब भी रोटी और रोजगार सबसे बड़ी चुनौतियाँ थीं जिनका सामना सरकार, समाज और संगठन (राजनैतिक एवं सामाजिक) को करना था। परन्तु इतना लम्बा अरसा बीत जाने के बावजूद देष को रोटी और रोजगार की सुरक्षा तो नहीं ही मिली बल्कि पानी के संकट की अकल्पनीय समस्या और खड़ी हो गई। किसानों ने अपने दायित्व के संदर्भ में कभी समाज के विष्वास को आघात नहीं पहुँचाया है। फिर भी कृषि और कृषक को लाभ पहुचाने वाली नीतियाँ और योजनायें नहीं बनाई गई। हरित क्रांति हुई परन्तु आंकड़ों और प्रयोगषाला के परिणामों के भार के नीचे छोटे और मध्यमवर्गीय किसानों की चीख दबकर रह गई। वह हमेषा देश का पेट भरता रहा, लोग चाहे 30 करोड़ रहे हों चाहे सौ करोड़, पसीने से खेत को सींच कर उसने अनाज उगाया। किसान ने किसी को भूखों नहीं मरने दिया पर सरकार ने किसान की मेहनत को अपने गोदामों में बंद करके भुखमरी के हालात जरूर पैदा कर दिये; आज भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में जितना अनाज भरा हुआ है यदि उन्हें बोरियों में भरकर एक के ऊपर एक रखा जाये तो चन्द्रमा तक पहुंचने वाली खाद्य रेखा बनाई जा सकती है और यदि यही अनाज देष के 40 फीसदी गरीबों को वितरित किया जाये तो हर एक परिवार के हिस्से में एक हजार किलो (दस क्विंटल) अनाज आयेगा। सच्चाई यह है परन्तु हकीकत कुछ और है कि लोग भूख से मर रहे हैं।